मणिपुर में जातीय हिंसा और राजनीतिक अस्थिरता के चलते मुख्यमंत्री एन बीरेन सिंह ने 9 फरवरी 2025 को अपने पद से इस्तीफा दे दिया, जिसके बाद राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू कर दिया गया है। राज्यपाल अजय भल्ला ने संविधान के अनुच्छेद 356 के तहत राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू करने की सिफारिश की, जिसे राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने मंजूरी दे दी। इसके साथ ही मणिपुर विधानसभा, जिसका कार्यकाल 2027 तक था, उसे भी निलंबित कर दिया गया है।
क्यों दिया बीरेन सिंह ने इस्तीफा?
मणिपुर में मैतेई और कुकी समुदायों के बीच पिछले 21 महीनों से जातीय हिंसा जारी है। इस हिंसा में अब तक 250 से अधिक लोगों की जान जा चुकी है, जबकि हजारों लोग विस्थापित हुए हैं। स्थिति इतनी गंभीर हो गई थी कि राज्य में कानून-व्यवस्था पूरी तरह से चरमरा गई थी और मुख्यमंत्री बीरेन सिंह की सरकार पर हिंसा को काबू करने में नाकाम रहने के आरोप लग रहे थे।
मुख्यमंत्री पर यह भी आरोप था कि उनकी सरकार ने हिंसा को रोकने के लिए पर्याप्त कदम नहीं उठाए और समुदायों के बीच बढ़ते तनाव को सुलझाने में असफल रही। इसके चलते उनके इस्तीफे की मांग जोर पकड़ने लगी थी।
इस्तीफे से पहले बीरेन सिंह ने नई दिल्ली में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से मुलाकात की थी। इस मुलाकात के कुछ घंटे बाद उन्होंने इंफाल लौटकर राज्यपाल अजय भल्ला को अपना इस्तीफा सौंप दिया। इसके बाद राज्यपाल ने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को स्थिति की रिपोर्ट भेजी और राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाने की सिफारिश की।

कैसे लागू हुआ राष्ट्रपति शासन?
गृह मंत्रालय द्वारा जारी अधिसूचना में कहा गया है कि मणिपुर में ऐसी स्थिति उत्पन्न हो गई थी, जहां राज्य की सरकार संविधान के प्रावधानों के अनुसार नहीं चल सकती थी। इसलिए, संविधान के अनुच्छेद 356 के तहत राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने राज्य सरकार के सभी कार्यों और राज्यपाल द्वारा प्रयोग की जाने वाली सभी शक्तियों को अपने अधीन कर लिया।
राष्ट्रपति शासन लागू होने के साथ ही मणिपुर विधानसभा को भी निलंबित कर दिया गया है। इसका कार्यकाल 2027 तक था, लेकिन अब विधानसभा की सभी कार्यवाहियों को स्थगित कर दिया गया है।
विपक्ष की प्रतिक्रिया और राजनीतिक घमासान
मणिपुर में राष्ट्रपति शासन लागू होने के बाद राजनीतिक सरगर्मियां बढ़ गई हैं। विपक्ष ने इसे भाजपा सरकार की ‘शासन करने में असमर्थता’ और ‘नाकामी’ करार दिया है।
लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने कहा, “मणिपुर में राष्ट्रपति शासन लागू करना भाजपा की सरकार की पूर्ण विफलता की स्वीकृति है। यह साबित करता है कि भाजपा राज्य में शांति और स्थिरता बहाल करने में पूरी तरह से नाकाम रही है।”
राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर भी निशाना साधा और पूछा कि क्या अब प्रधानमंत्री मणिपुर का दौरा करेंगे और राज्य में शांति बहाल करने की अपनी योजना स्पष्ट करेंगे? उन्होंने यह भी कहा कि मणिपुर की स्थिति को नजरअंदाज करना और इसे राजनीतिक नजरिए से देखना राज्य की जनता के साथ अन्याय होगा।
जातीय हिंसा का कारण और पृष्ठभूमि
मणिपुर में जातीय हिंसा की जड़ें गहरी हैं। यह विवाद मुख्य रूप से मैतेई और कुकी समुदायों के बीच जमीन, आरक्षण, और राजनीतिक प्रतिनिधित्व को लेकर है।
मैतेई समुदाय राज्य की कुल जनसंख्या का लगभग 53% हिस्सा है और मुख्य रूप से इंफाल घाटी में केंद्रित है। वे अनुसूचित जनजाति (ST) का दर्जा मांग रहे हैं, ताकि उन्हें भी आरक्षण का लाभ मिल सके।
वहीं, कुकी और नागा समुदाय पहाड़ी इलाकों में रहते हैं और पहले से ही ST के तहत आरक्षण का लाभ उठा रहे हैं। उन्हें डर है कि अगर मैतेई समुदाय को भी ST का दर्जा मिल गया, तो उनके हिस्से का आरक्षण और जमीन पर अधिकार खतरे में पड़ सकता है।
इन्हीं मुद्दों को लेकर दोनों समुदायों के बीच लंबे समय से तनाव बना हुआ है, जो समय-समय पर हिंसा का रूप ले लेता है। पिछले 21 महीनों में यह हिंसा भड़क उठी, जिसमें सैकड़ों लोग मारे गए और हजारों को अपना घर छोड़ना पड़ा।
क्या होगा आगे का रास्ता?
मणिपुर में राष्ट्रपति शासन लागू होने के बाद अब राज्य में शांति और स्थिरता बहाल करने की जिम्मेदारी केंद्र सरकार की है।
गृह मंत्रालय ने सुरक्षा बलों की तैनाती बढ़ा दी है और कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए कड़े कदम उठाए जा रहे हैं। इसके अलावा, हिंसा प्रभावित क्षेत्रों में कर्फ्यू और इंटरनेट बैन जैसे प्रतिबंध भी लगाए गए हैं।
राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि मणिपुर में स्थायी शांति तभी संभव है, जब सभी समुदायों के बीच संवाद स्थापित हो और उनकी चिंताओं को दूर किया जाए।
इसके लिए केंद्र सरकार को एक व्यापक और निष्पक्ष शांति योजना तैयार करनी होगी, जिसमें सभी पक्षों को शामिल किया जाए और उनकी समस्याओं का समाधान निकाला जाए।
मणिपुर में राष्ट्रपति शासन लागू होना एक बड़ा राजनीतिक घटनाक्रम है, जिसने राज्य की राजनीति को नए मोड़ पर ला खड़ा किया है।
बीरेन सिंह के इस्तीफे के बाद भाजपा को मणिपुर में नई नेतृत्व रणनीति बनानी होगी, जबकि विपक्ष इस मुद्दे को जोर-शोर से उठाकर भाजपा को घेरने की कोशिश कर रहा है।
क्या राष्ट्रपति शासन मणिपुर में शांति और स्थिरता बहाल कर पाएगा या राजनीतिक संकट और गहराएगा? यह देखने वाली बात होगी।
देशभर की नजरें अब मणिपुर पर टिकी हैं, जहां एक ओर शांति बहाल करने की चुनौती है, तो दूसरी ओर राजनीतिक समीकरणों में बड़े बदलाव की संभावना भी।

